अपरा एकादशी का महात्म्य
देश और दुनिया भर में आज अपरा एकादशी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। भक्तजन पूर्ण श्रद्धा एवं भक्ति भाव से श्रीहरि विष्णु कीपूजा-अर्चना कर रहे हैं। पूरा माहौल भक्तिमय है। घरों से लेकर मंदिरों तक में भक्तों का तांता लगा हुआ है। वास्तव में प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ महीने में कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विशेष विधान है। अपरा एकादशी को अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
देश और दुनिया भर में आज अपरा एकादशी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। भक्तजन पूर्ण श्रद्धा एवं भक्ति भाव से श्रीहरि विष्णु कीपूजा-अर्चना कर रहे हैं। पूरा माहौल भक्तिमय है। घरों से लेकर मंदिरों तक में भक्तों का तांता लगा हुआ है। वास्तव में प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ महीने में कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विशेष विधान है। अपरा एकादशी को अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
मानव जीवन में इस एकादशी का अत्यंत ही गहन महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस एकादशी का उपवास रखने से समस्त पापों एवं संतापों का शमन हो जाता है भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा से व्रतकर्ता को संसार की समस्त खुशियां प्राप्त होती हैं। शास्त्रों के अनुसार जितना पुण्य मकर संक्रांति के समय गंगा स्नान करने से, सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र और महाशिवरात्रि के समय काशी में स्नान करने से प्राप्त होता है, उसके ही समान पुण्य की प्राप्ति अपरा एकादशी व्रत करने से होती है।
अपरा एकादशी की कथा
अपरा एकादशी के व्रत का माहात्म्य बताने वाली कहानियां पौराणिक ग्रंथों में मिलती हैं। एक कथा के अनुसार किसी राज्य में महीध्वज नाम का एक बहुत ही धर्मात्मा राजा था। राजा महीध्वज जितना नेक था उसका छोटा भाई वज्रध्वज उतना ही पापी था। वज्रध्वज, महीध्वज से द्वेष करता था और उसे मारने के लिए षड़यंत्र रचता रहता था। एक बार वह अपने मंसूबे में कामयाब हो जाता है और महीध्वज को मारकर उसे जंगल में फेंकवा देता है और खुद राज करने लगता है। अब असामयिक मृत्यु के कारण महीध्वज को प्रेत का जीवन जीना पड़ता है। वह पीपल के पेड़ पर रहने लगता है। उसकी मृत्यु के पश्चात राज्य में उसके दुराचारी भाई से तो प्रजा दुखी थी ही साथ ही अब महीध्वज भी प्रेत बनकर आने जाने वाले को दुख पंहुचाने लगा था। लेकिन उसके पुण्यकर्मों का सौभाग्य कहिए कि उधर से एक पंहुचे हुए ऋषि गुजर रहे थे। उन्हें आभास हुआ कि कोई प्रेत उन्हें तंग करने का प्रयास कर रहा है। अपने तपोबल से उन्होंने भूत के भूत को देख लिया और उसका भविष्य सुधारने का जतन सोचने लगे। सर्वप्रथम उन्होंने प्रेत को पकड़कर उसे अच्छाई का पाठ पढ़ाया, फिर उसके मोक्ष के लिए स्वयं ही अपरा एकादशी का व्रत रखा और संकल्प लेकर अपने व्रत का पुण्य प्रेत को दान कर दिया। इस प्रकार उसे प्रेत जीवन से मुक्ति मिली और वह बैकुंठ गमन कर गया।
एक अन्य कथा के अनुसार एक बार एक राजा ने अपने राज्य में एक बहुत ही मनमोहक उद्यान तैयार करवाया। इस उद्यान में इतने मनोहर पुष्प लगते कि देवता भी आकर्षित हुए बिना नहीं रह सके और वे उद्यान से पुष्प चुराकर ले जाते। राजा चोरी से परेशान,लगातार विरान होते उद्यान को बचाने के सारे प्रयास विफल नज़र आ रहे थे। अब चोरी कोई इंसान करे तो पकड़ में आए, देवता दबे पांव आते और अपना काम कर निकल जाते, किसी को कानों कान खबर नहीं होती। अब राजपुरोहितों को याद किया गया। सभी ने अंदाजा लगाया कि है तो किसी दैविय शक्ति का काम, किसी इंसान की हिम्मत तो नहीं हो सकती। उन्होंने सुझाव दिया कि भगवान श्री हरि के चरणों में जो पुष्प हम अर्पित करते हैं, उन्हें उद्यान के चारों और डाल दिया जाए। देखते हैं बात बनती है या नहीं। और तो कोई विकल्प था नहीं, इसलिए ऐसा ही किया गया। देवता और अप्सराएं नित्य की तरह आए लेकिन दुर्भाग्य से एक अप्सरा का पैर भगवान विष्णु को अर्पित किए पुष्प पर रखा गया, जिससे उसके समस्त पुण्य समाप्त हो गए और वह अन्य साथियों के साथ उड़ान न भर सकी। सुबह होते ही इस अद्वितीय युवती को देखकर सब हैरान, राजा को खबर की गई, राजा भी देखते ही सब भूल कर मुग्ध हो गए। अप्सरा ने अपना अपराध कुबूल करते हुए सारा वृतांत कह सुनाया और अपने किए पर पश्चाताप किया। तब राजा ने कहा कि हम आपकी क्या मदद कर सकते हैं? तब उसने कहा कि यदि आपकी प्रजा में से कोई भी ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का उपवास रखकर उसका पुण्य मुझे दान कर दे, तो मैं वापस लौट सकती हूं। राजा ने प्रजा में घोषणा करवा दी, ईनाम की रकम भी तय कर दी, लेकिन कोई उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं मिली। राजा पुरस्कार की राशि बढाते-बढ़ाते आधा राज्य तक देने पर आ गया, लेकिन कोई सामने नहीं आया। किसी ने एकादशी व्रत के बारे में तब तक सुना भी नहीं था। न राजा ही जानता था न पुरोहित, प्रजा में जानने का तो सवाल ही नहीं होता। परेशान अप्सरा ने चित्रगुप्त को याद किया तब अपने बही खाते से देखकर जानकारी दी कि इस नगर में एक सेठानी से अंजाने में एकादशी का व्रत हुआ है। यदि वह संकल्प लेकर व्रत का पुण्य तुम्हें दान कर दे, तो बात बन सकती है। उसने राजा को यह बात बता दी। राजा ने ससम्मान सेठ-सेठानी को बुलाया। पुरोहितों द्वारा संकल्प करवाकर सेठानी ने अपने व्रत का पुण्य उसे दान में दे दिया। जिससे अप्सरा राजा और प्रजा का धन्यवाद कर स्वर्ग लौट गई। वहीं अपने वादे के मुताबिक सेठ-सेठानी को राजा ने आधा राज्य दे दिया। राजा अब तक एकादशी के महत्व को समझ चुका था। उसने आठ से लेकर अस्सी साल तक राजपरिवार सहित राज्य के सभी स्त्री-पुरुषों के लिये वर्ष की प्रत्येक एकादशी का उपवास अनिवार्य कर दिया।
ऐसे करें अपरा एकादशी व्रत की पूजा
एकादशी के उपवास में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। जैसा कि मैंने आपको पूर्व में बताया कि एकादशी उपवास के लिए व्रती को दशमी तिथि से ही नियमों का पालन आरंभ कर देना चाहिए। दशमी तिथि को रात्रि के समय सात्विक अल्पाहार ग्रहण करना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन बहुत आवश्यक होता है। इसके अलावा व्रती मन से, वचन से और कर्म से शुद्ध आचरण रखे। एकादशी के दिन प्रातःकाल उठकर नित्य क्रियाओं से निबट कर, स्नानादि के परांत स्वच्छ होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। तत्पश्चात भगवान विष्णु, भगवान श्री कृष्ण एवं बलराम जी का पूजन करना चाहिए। जहां तक संभव हो निर्जला उपवास रखना चाहिए, अन्यथा एक समय फलाहार तथा जल ग्रहण कर सकते हैं। रात्रि में भगवान का जागरण करना चाहिए और द्वादशी के दिन ब्राह्मण को भोजन करवाकर दान-दक्षिणा से संतुष्ट कर स्वयं आहार ग्रहण कर व्रत का पारण करना चाहिए।

srisangam

Comments (0)